Hindi Notes

THE HORSE CLASS 12th FULL STORY IN HINDI CHAPTER 4 MGS GYAN BOOKS

सम्पूर्ण पाठ का हिन्दी में अनुवाद

 THE HORSE; FULL EXPLANATION IN HINDI

सृष्टि के रचयिता (ईश्वर) के मन में उस समय एक नया विचार आया जब संसार के सृजन का कार्य लगभग समाप्त हो गया था।

उसने एक सहायक को बुलवाया और कहा, "मेरे लिए कुछ और सामग्रियाँ लाओ, मैं पशु की एक नई नस्ल सहायक ने घुटने टेककर उत्तर दिया, "परमपिता, जब, सृजन के उत्साह में आपने हाथी, हेल, शेर और बनाऊंगा।"

अजगर बनाए, आपने तनिक भी उस पदार्थ की मात्रा के विषय में नहीं सोचा जो उनमें लगी भारी और कठोर सामान में से बहुत थोड़ी-सी सामग्री बची है। परन्तु हल्की सामग्री अब भी भण्डार में पर्याप्त है।" इस बार स्रष्टा ने कठोर सामग्रियों में से केवल थोड़ी-सी लगाने का ध्यान रखा। उस नए पशु को, जो उसने बनाया, उसने न सींग दिए न पंजे उसने उसे ऐसे दाँत दिए जो चबा सकते थे परन्तु काट नहीं सकते थे। जो शक्ति उसने उसे दी वह उसे युद्ध क्षेत्र में उपयोगी बनाने के लिए पर्याप्त थी, परन्तु उसने उसे युद्ध के लिए कोई रुचि नहीं स्स्रष्टा ने एक क्षण के लिए सोचा: “अच्छा, जो भी तुम्हारे पास है मुझे ला दो।"

दी। वह पशु घोड़ा कहलाया जाने लगा। स्रष्टा ने उसके बनाने में ऐसे पदार्थ का पर्याप्त भाग लगा दिया था जिनसे कि वायु और आकाश बने हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि उस पशु का मस्तिष्क स्वतन्त्रता की लालसा से भरा था। वह वायु के साथ दौड़ लगाता और उस स्थान तक तेज दौड़कर पहुँचता जहाँ आकाश पृथ्वी को छूता था अर्थात् घोड़े में निरन्तर दौड़ने की असीम क्षमता थी। अन्य पशु किसी उद्देश्य से दौड़ते थे, परन्तु घोड़ा बिना किसी स्पष्ट कारण के इधर-उधर दौड़ लगाता, मानो वह अपने आप से दूर उड़ जाने को आतुर हो। वह लड़ता नहीं था, वह शिकार पर झपटता नहीं था, परन्तु केवल दौड़ते रहना पसन्द करता था। बुद्धिमान लोग कहते हैं कि ऐसा तब होता है जब आप में वायु और आकाश के तत्व बहुत अधिक हों।

स्रष्टा अपने इस कार्य से बहुत प्रसन्न हुआ। कुछ पशुओं को रहने के लिए उसने वन दिए, कुछ को उसने गुफा या माँद दी। परन्तु वह घोड़े को निरुद्देश्य दौड़ लगाते देखना पसन्द करता था, उसने उसे एक खुला मैदान दिया।

उस मैदान के बाहर मनुष्य रहता था। वह उन बोझों के भार से झुक गया था जिनको उसने इकट्ठा कर लिया था। जब उसने घोड़े को देखा, वह जान गया कि यदि किसी प्रकार, वह उसे पकड़ सके तो वह अपने बोझ को उसकी पीठ पर लादने में समर्थ हो सकेगा।

एक दिन उसने अपना जाल फेंककर घोड़े को पकड़ लिया। उसने उसकी पीठ पर एक जीन रख दी और मुँह में एक लगाम और उसे एक कारागार में बन्द कर दिया अर्थात् अपने अस्तबल में बाँध लिया। चीता अपने जंगल के घर में रहा और शेर अपनी गुफा में, परन्तु घोड़े ने अपना घर (खुला मैदान) खो दिया।

स्वतन्त्रता के लिए अपने प्रगाढ़ प्रेम के होते हुए भी वह बन्धन मुक्त नहीं हो सका। जब उसके लिए जीवन असहनीय हो गया, उसने अपने कारागार की दीवारों पर बहुत जोर से लात मारी। इससे घोड़े के खुरों की अपेक्षा दीवार को कम चोट पहुँची। परन्तु लगातार लातों के बाद, पलस्तर के टुकड़े गिरने लगे। इससे मनुष्य को क्रोध आ गया। उसने कहा, “इसे कृतघ्नता कहते हैं। मैं इसे खिलाता हूँ, मैने इसकी देखभाल करने के लिए नौकर रखे हैं; परन्तु दुष्ट जानवर मेरे उपकारों को नहीं देखता।” घोड़े को पालतू बनाने के लिए दृढ़ कदम उठाए गए। अन्त में मनुष्य गर्व के साथ कह सका कि घोड़े से अधिक उसके प्रति वफादार और कोई प्राणी नहीं है।

पंजे और सोग उसके पास पहले से ही नहीं थे, न उसके पास ऐसे दाँत थे जो काट सके। कोड़े के डर से लात मारना भी उसे छोड़ना पड़ा। जो कुछ अब उसके पास बचा था, वह था उसका हिनहिनाना।।

एक दिन स्रष्टा ने दुःखभरी हिनहिनाहट सुनी। वह अपने ध्यान से जागा और ऊपर से हो पृथ्वों के खुले मैदानों पर देखा। घोड़ा वहां नहीं था। उसने मृत्यु को बुलवाया और कहा, "यह तुम्हारा काम है, तुमने मेरे घोड़े को पकड़ लिया है। "डाले।"

मृत्यु ने कहा, "अविनाशी पिता, आप सदा मुझ पर सन्देह करते हैं, परन्तु कृपा करके मनुष्य के घर पर दृष्टि स्रष्टा ने फिर नीचे देखा और घोड़े को एक संकरी दीवार से घिरी जगह में दीनता से हिनहिनाते देखा। उसका हृदय करुणा से भर गया और उसने मनुष्य से कहा, "यदि तुमने घोड़े को स्वतन्त्र नहीं किया तो मैं इसको चीते के समान दाँत और पंजे दे दूंगा।"

मनुष्य ने कहा, "परमपिता आपका यह प्राणो स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है। देखिए, मैंने इसकी सुख-सुविधा के लिए कितना अच्छा अस्तबल बनाया है।"

परन्तु स्रष्टा ने जोर देकर कहा कि थोड़े को स्वतन्त्र किया जाना चाहिए। मनुष्य ने कहा, "मैं आपकी इच्छा का पालन करूंगा। परन्तु मुझे विश्वास है कि आप एक सप्ताह में अपना विचार बदल देंगे और सहमत होंगे कि मेरा अस्तबल इसके लिए सर्वोत्तम स्थान है।"

मनुष्य ने तब घोड़े की आगे की टाँगों को रस्सी से एक साथ बांध दिया और उसे स्वतन्त्र कर दिया। इस प्रकार बांध देने पर घोड़ा केवल मेढक की भाँति इधर-उधर फुदक सकता था। स्वर्ग से स्रष्टा घोड़े को देख सकता था, परन्तु रस्सी को नहीं वह शर्म से लाल हो गया-तो इस प्रकार को प्राणी बनाया है मैने उसने अपने मन में स्वीकार किया कि उसकी भयंकर भूलों में से एक भूल यह भी है।

मनुष्य ने कहा, "अब इसका क्या किया जाए? क्या स्वर्ग में खुले मैदान नहीं है जहाँ इसे घूमने के लिए भेजा जा सके ?"

स्रष्टा ने उत्तर दिया, "मैं इससे भर गया। इस प्राणों को अपने अस्तबल में ले जाओ।" मनुष्य ने कहा, "परन्तु, परमपिता, मेरे लिए यह बोझ होगा।"

स्वष्टा ने उत्तर दिया, "हाँ, परन्तु बोझ को स्वीकार करके तुम अपने हृदय की विशालता का परिचय दोगे।"

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