एक मुलाक़ात- Ek Mulaqaat


एक मुलाक़ात


मैं दिल्ली के मेट्रो स्टेशन पहुँचा ही था कि मेरे फोन की घंटी बजी। मैंने फोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई जो किसी लड़की की लग रही थी।
“हैलो !!” मैंने कहा।
“जी, क्या मेरी बात मि॰ अमन से हो रही है?” उसने पूछा।
“जी बोल रहा हूँ। बताइये।“
“मैं दृष्टि फ़ाउंडेशन से बात कर रही हूँ। क्या मैं आपका 2 मिनट ले सकती हूँ?”
“जी बताइये।“ मैंने अधूरे मन से उत्तर दिया।
मैं उससे बात कर रहा था जबकि मेरा ध्यान मेरी ट्रेन की तरफ था। मैं टिकट की लाइन खड़ा था। लेकिन वहाँ टिकिट लेने के लिए ऑटोमैटिक मशीन लगी थी लेकिन वो केवल स्मार्ट कार्ड वालों के लिए थी और मेरे पास स्मार्ट कार्ड नहीं था इसलिए मैं लाइन मे खड़ा था।
“सर, हमारी संस्था दृष्टिहीन बच्चो का आश्रम चलाती है और हमारी संस्था मे करीब 1500 बच्चो का भरण-पोषण होता है।“
“जी बहुत अच्छी बात है। मैं क्या कर सकता हूँ? आप ये बताइये।“ मैंने जल्दी




में कहा।
“सर, मैंने आपके पास फोन इसलिए किया है क्यूंकी हम आपसे कुछ दान चाहते हैं। एक लड़की है जिसका नाम सुमन है और उसके इलाज के लिए 50 लाख रुपये
की जरूरत है तो अगर आप कुछ मदद कर दोगे तो अच्छा होगा।“
“अच्छा जी, मैं कैसे मदद कर सकता हूँ आपकी?” मैंने उत्सुकतावश पूछा।
“सर आप ऑनलाइन ट्रान्सफर कर सकते हैं। आप चाहे तो क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड भी उपयोग कर सकते हैं।“
“ठीक हैं। आप अपनी वैबसाइट का पता मुझे ईमेल कर दीजिये।“
“सर, आप अपनी ईमेल आईडी बता दीजिये मैं आपको सारी चीजें भेज दूँगी।“
मैंने जल्दी से उसे ईमेल आईडी बताई और फोन रख दिया।
मैं प्लेटफॉर्म न॰ 2 की तरफ गया क्योंकि मुझे ट्रेन वही से पकड़नी थी।
ट्रेन अगले 2 मिनट मे आने वाली थी। मैंने अपनी जेब मे हाथ डाला उसमे मेट्रो का टोकन था और दस रुपये का नोट भी था। मैंने टोकन को संभाल कर दूसरे जेब मे रख लिया और दस रुपये उसी मे रहने दिये।
मेरी ट्रेन आ चुकी थी। सबने अंदर जाने के लिए दौड़ लगा दी।
तभी एक आवाज़ आई, “अरे भाई पहले बाहर तो निकलने दो फिर अंदर चले जाना।”
अगले मिनट मे मेट्रो के दरवाजे बंद हो चुके थे और मेट्रो एक बार फिर दौड़ पड़ी। मुझे एक आखिरी सीट मिली जो की महिला आरक्षित थी। मैंने आसपास देखा की कोई महिला तो नहीं। आसपास की सभी महिलाएं सीट पर बैठी हुयी थी और डिब्बे मे ज्यादा भीड़ भी नहीं थी। मैं बिना समय व्यर्थ किए सीट पर बैठ गया।
मेट्रो अंदर से वातानुकूलित होती है। डिब्बे मे बहुत ठंडक थी। मैंने खंबे से सिर टिकाया और आंखे बंद कर ली क्योंकि स्टेशन अभी दूर था जो अभी आधे घंटे मे आना था। इसलिए मैं निश्चिंत होकर बैठ गया और आंखे बंद करके थोड़ा आराम करने लगा।
अभी मुश्किल से चार स्टेशन ही गुजरे थे कि एक लड़की आई और मुझसे उठने को कहा, “ये महिला सीट है, उठिए !”
“जी बिलकुल, मैं उठ जाता हूँ। आप बैठ जाइए।”
मुझे पहले ही मालूम था कि वो सीट महिला आरक्षित है इसलिए बिना कुछ कहे उठ गया और सीट लड़की को दे दी।
वो बैठ गयी और कानो में ईयर फोन लगाकर गाना सुनने लगी।
मैं उसके सामने वाले दरवाजे पर खड़ा था। मैंने अपना हाथ ऊपर खंभे पर रखा हुआ था जिससे मेरी पकड़ मजबूत बनी रहे।
मैं डिब्बे में अकेला नहीं था जो खड़ा हुआ था। उस डिब्बे मे बहुत से लोग थे जो खड़े हुये थे।
अचानक मेरे फोन कि घंटी बजी। मैंने फोन उठाया।
“हैलो !!” मैंने कहा।
“हैलो अमन, मैं रंजना बोल रही हूँ।” उधर से आवाज आई।
मैं आवाज पहचान गया। मेरी चचेरी बहन रंजना की आवाज थी।
“हाँ रंजना ! बोलो बहन, क्या हाल चाल हैं? कहाँ है तू? आज तुझे और तेरी सहेली, क्या नाम है उसका?........ हाँ सौम्या, मुझसे मिलना था। मैं राजीव चौक पहुँचने वाला हूँ।”
“अरे भाई, थोड़ा रुको। कितने सारे सवाल एक साथ कर रहे हो !!”

“अच्छा ठीक है। अब बोल कहा है तू?”
“मैं पालिका बाज़ार आई थी वहाँ मुझे मौसी मिल गयी। अब मैं उनके साथ वसंत विहार जा रही हूँ। और सौम्या आपसे मिलने अकेले आ रही है। आप उससे मिल लेना और उसकी जो भी समस्या होगी वो सुलझा देना। मैं आपसे शाम को बात करूंगी।”
“ओ मेरी बहना, ये क्या कह रही हो तुम? यार वो अकेले आ रही है तो कैसे ठीक रहेगा? मै कैसे बात करूंगा? मै आजतक उससे मिला भी नहीं हूँ।” मैं आश्चर्य में था।
“भाई आप तो ऐसे नहीं थे। आप लड़की से बात करने मे हिचक रहे हो ये सोचने वाली बात है।”
“अरे वो बात नहीं है यार, वो तेरी सहेली है। किसी और लड़की से बात करना आसान है। क्यूंकी उससे मैं चाहे जैसे बात कर सकता हूँ।”
“कोई बात नहीं। सौम्या उच्च विचारो वाली लड़की है, आप उससे आसानी से बात कर सकते हो।”
“ठीक है यार। चल तुझसे बाद मे बात करता हूँ, स्टेशन आ गया है। अपना ख्याल रखना।”
“ठीक है भाई, आप भी ख्याल रखना अपना। शाम को बात करते हैं।”
इतना कहकर उसने फोन रख दिया। मैंने भी फोन जेब मे रखा और प्लेटफॉर्म पर उतर गया। प्लेटफॉर्म पर भीड़ थी। क्योंकि राजीव चौक से कई जगह के लिए लोग मेट्रो बदलते हैं।
मैं प्लेटफॉर्म से बाहर आया। मुझे रेस्टोरेन्ट जाना था लेकिन मुझे रास्ता नहीं पता था। मैंने रंजना का संदेश खोला जो उसने कल रात मुझे भेजा था। उस संदेश मे रेस्टोरेन्ट का लिखा था। मैंने गूगल के नक्शे में वो पता डाला और खोजने का बटन दबाया। अगले ही पल मेरे सामने आसपास के एरिया के कई सारे उसी नाम से मिलते जुलते कई रेस्टोरेन्ट की लिस्ट आ गयी।
मैंने पहला वाला रेस्टोरेन्ट खोला लेकिन वो किसी बड़े होटल का पता लग रहा था। मैंने दूसरा वाला देखा फिर तीसरा और चौथा। लेकिन मुझे कोई भी रेस्टोरेन्ट संतुष्ट नहीं कर पाया।
मैंने एक बार फिर से रंजना का संदेश खोला और पढ़ा। उसने पहचान के तौर पर बगल की एक दुकान का भी नाम लिखा था। मैंने एक बार फिर से गूगल नक्शा खोला और अगला रेस्टोरेन्ट देखने के लोए उसे खोल और उसके आसपास का क्षेत्र देखा। मुझे वो बगल वाली दुकान मिल गयी। मैंने उस रेस्टोरेन्ट तक जाने के लिए रास्ता देखा और फिर उसी रास्ते पर चल पड़ा।
पंद्रह मिनट चलने के बाद मैं रेस्टोरेन्ट के सामने खड़ा था। मैंने अंदर प्रवेश किया। दरवाजे पर खड़े दरबान से झुककर अभिवादन किया। अब मुझे सौम्या को ढूँढना था। मैं उस तरफ गया जहां कुर्सियाँ और मेजें लगी हुई थी। बहुत सारे लोग वहाँ बैठे हुये थे।
अब समस्या ये थी सौम्या को पहचाना कैसे जाय? मैं इस बारे मे सोंच ही रहा था की अचानक मुझे ख्याल आया की कल ही रंजना ने फेसबुक पर अपनी और सौम्या की एक फोटो पोस्ट की थी।
मैंने तुरंत फेसबुक खोला और रंजना की प्रोफ़ाइल खोली।
मुझे वो फोटो मिल गयी जिसमे रंजना और सौम्या दोनों थी।
लेकिन ये क्या? ये तो वही मेट्रो वाली लड़की है और ये ही सौम्या है।
मैंने फोन जेब मे रखा और सौम्या को ढूँढने लगा।
टेबल न॰ 21 पर वो बैठी हुई थी और बार बार अपनी हाथ मे घड़ी ऐसे देख रही थी जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो। मैं समझ गया कि ये मेरा ही इंतज़ार कर रही है।
मैं उस तरफ जाने लगा। टेबल के सामने पहुँचकर मैंने कहा, “हेलो सौम्या”
उसने मेरी तरफ चेहरा घुमाया तो अचानक उसके चेहरे के भाव बदल गए।
“तुम मेरा पीछा कर रहे हो?” उसने लगभग चिल्लाते हुये कहा।
“नहीं जी, मैं आपका पीछा बिलकुल नहीं कर रहा। मैं क्यों आपका.....”
“नहीं तो क्या, मेट्रो मे भी मेरे साथ थे और अब यहाँ भी आ गए।” उसने मेरी बात बीच मे ही काटते हुये कहा।
“अरे मेरी बात तो सुनो। मैं कोई तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा।” मैंने समझाने को कोशिश की।
“अच्छा, फिर क्यों मेरे पास आकर मुझे ही बुला रहे हो? मैं तो तुम्हें जानती भी नहीं।”
“अरे, मै वही तो बताने आया हूँ। मैंने तुम्हारी फोटो फेसबुक पर देखी जिसमे तुम रंजना के साथ हो।”
“अच्छा तो तुम मुझे फेसबुक पर भी फॉलो कर रहे हो। यार अच्छे खासे घर के लगते हो और काम छिछोरेपन वाले करते हो।” उसने फिर से मूंह बनाते कहा।
“अरे मेरी बात तो सुनो, मुझे मेरी बात कहने का मौका तो दो।”
“जी नहीं, मैं अंजान लोगों से बात नहीं करती। और मेरा पीछा करना बंद करो वरना अभी मेरी सहेली का भाई आने वाला है। वो तुम्हारी खबर लेगा। इसलिए तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि अब तुम यहाँ से निकल लो।”
“सौम्या !!” मैंने उसका नाम ज़ोर से लिया।
“अरे तुमने फिर मेरा नाम लिया और तुमको मेरे नाम कैसे मालूम है?” उसने फिर गुस्से मे कहा। “अच्छा फेसबुक से मिला होगा।”
मैंने देखा कि लोग हम लोगों को ही देख रहे हैं और रेस्टोरेन्ट स्टाफ से एक आदमी हमारी तरफ आ रहा था। मैं यहाँ कोई घटना नहीं चाहता था।
“मैं अमन हूँ, रंजना का भाई। उसी ने मुझे यहाँ भेजा है। तुम्हें कोई काम था मुझसे।” मैंने उससे कहा।
“क्या?? आप अमन हो ??” अचानक ये बोलते ही उसका चेहरा उतर गया।”
“हाँ, मैं अमन हूँ।” मैंने कहा।
“मुझे माफ कर दीजिये, मुझे पता नहीं था। मुझे लगा कि कोई मेरा पीछा कर रहा है, इसलिए मैंने गुस्से मे इतना बोल दिया। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।” उसने अपनी नज़रें झुका रखी थी। वो वाकई मे शर्मिंदा लग रही थी।
“अरे कोई बात नहीं, अब इतना शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।” मैंने हँसते हुये कहा और अपनी कुर्सी ठीक करके आगे की ओर खींचा जो कि पीछे सरक गयी थी।
“नहीं, इतनी छोटी बात नहीं है। आप मेरे लिए आए हैं और मैंने आपको इतना भला बुरा कह दिया, आप गुस्सा मत होना और रंजना को भी मत बताना । वो मुझ पर चिल्लाएगी और गुस्सा करेगी।” उसने बहुत ही सहज लहजे मे कहा।
“मैं किसी को नहीं बताऊंगा। तुम चिंता ना करो।” मैंने उसे समझाते हुये कहा। “क्या हम लोग कुछ खा सकते हैं? और फिर बात करे।” मैंने पेट पर हाथ रखते हुये उससे कहा।
“हाँ, बिलकुल। लीजिये मेन्यू कार्ड।” उसने मुझे मेन्यू कार्ड दिया।
“लेकिन एक शर्त हैं सौम्या।”
“वो क्या?” उसने मेरी तरफ देखते हुये पूछा।
“खाने का बिल मैं दूंगा।”
“बिलकुल नहीं। मैंने आपको बुलाया है इसलिए बिल मैं दूँगी।”
“जी नहीं। तुम मेरी बहन की सहेली हो। अगर तुम्हारी जगह वो होती तो बिल मैं देता इसलिए ये बिल मैं दूंगा।” मैं उसे समझाने कि कोशिश कर रहा था।
“जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। रंजना होती तो भी मैं उसे बिल नहीं देने देती। और वैसे भी हम लोग पहली बार मिल रहे हैं तो मेरा बिल बनता है।” वो ज़िद कर रही थी।
“बिलकुल नहीं। अच्छा ऐसा करते हैं। इस बार बिल मैं दूंगा और जब अगली बार हम मिलेंगे तो तुम बिल दे देना।” मैंने उसे सुझाव दिया।
“यही बात अगर मैं कहूँ कि अगली बार का बिल आप देना तो?” उसने मेरी बात मुझ पर ही डाल दी।
“लेकिन सौम्या............”
उसने मुझे बीच मे ही रोकते हुये कहा।
“लेकिन वेकीन कुछ नहीं। इस बार बिल मैं दे रही हूँ। अगली बार आप दे देना और आप कुछ नहीं बोलेंगे।” उसने मुँह पर उंगली रखते हुये कहा।
“ठीक है मैडम। जैसा आप कहे।” मैं चुपचाप मेन्यू कार्ड देखने लगा।

वो अपने मोबाइल मे कुछ देख रही थी जबकि मैं मेन्यू कार्ड के पन्ने पलट रहा था।
“आप कितना समय लगा रहे हैं? कुछ ऑर्डर कीजिये।” उसने मुझसे कहा।
“हाँ,मैं वही देख रहा हूँ।” मैंने पन्ने पलटते हुये कहा।
उसने एक मिनट इंतज़ार किया और फिर कहा, “लाइये मेन्यू कार्ड मुझे दीजिये, मैं कुछ ऑर्डर करती हूँ। और आपको खाना पड़ेगा।”
इतना कहते हुये उसने मुझसे मेन्यू कार्ड ले लिया। मैंने भी उसे मेन्यू कार्ड बिना कुछ कहे दे दिया।
“जो भी ऑर्डर करना वो मीठा ना हो और तैलीय नहीं होना चाहिए।” मैंने उससे अपनी पसंद बताते हुये कहा।
उसने गर्दन ऊपर करते हुये मुझे देखा और कहा, “आप मीठा नहीं खाते हो ये तो बहुत अच्छी बात है। मैं भी नहीं खाती हूँ। मैं यही सोच रही थी कि आपके लिए मीठे में क्या मंगाऊँ?”
“बिलकुल नहीं। मैं मीठा नहीं खाता हूँ। बहुत नुकसान दायक होता है सेहत के लिए।” मैंने उसे अपनी राय देते हुये कहा।
“ठीक है। मैं कुछ हल्की चीज मंगाती हूँ जो हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा।”

इतना बोलकर उसने वैटर को बुलाया। उसने दो टमाटर सूप और ग्रिल्ड पनीर टिक्का ऑर्डर किया। उसने साथ मे दो बिना दूध और शक्कर वाली कॉफी भी ऑर्डर की।
वैटर ऑर्डर लेकर चला गया।
मैंने उससे पूछा, “चलो खाने का ऑर्डर तो हो गया। अब तुम अपनी समस्या बताओ जिसके लिए तुम यहाँ आई हो।”
“हाँ बिलकुल। मैं भी यही बताने वाली थी।”
उसने अपना लैपटाप निकाला और स्विच ऑन किया।
उसके लैपटाप की स्क्रीन पर दीपिका पादुकोन की फोटो लगी हुयी थी। ये वालपेपर मेरा जाना पहचाना हुआ था। ये उसकी सबसे पहली मूवी “ॐ शांति ॐ” का पोस्टर था। “ॐ शांति ॐ” मेरी पसंदीदा फिल्मों मे से एक थी।
उसने एक माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड की फ़ाइल खोली । वो किसी ट्रेनिंग की रिपोर्ट लग रही थी। फिर लैपटाप की स्क्रीन मेरी तरफ कर दिया।



“ये मेरी ट्रेनिंग की रिपोर्ट है। मैंने गर्मी की छुट्टियों मे हिंदुस्तान ऐरोनौटिक्स लिमिटेड मे ट्रेनिंग की थी। अब हम लोगों को सेमिनार मे भाग लेना है और फिर प्रेजेंटेशन देनी हैं। मुझे कुछ समझ मे नहीं आ रहा है कि प्रेजेंटेशन कैसे बनाऊँ?”
“ठीक है। तुम अपनी रिपोर्ट मुझे मेल कर दो। मैं एक बार रिपोर्ट पढ़ लेता हूँ फिर बताता हूँ। तुमको परेशान होने कि जरूरत नहीं है। ये बहुत आसान है।” मैंने उसको समझाया। “तुमको प्रेजेंटेशन कब देना है?”
“वो तो है। लेकिन मेरे पास केवल एक हफ्ता है। अगले हफ्ते मुझे प्रेजेंटेशन देना है।”
“ठीक है। मैं तुमको कल बताता हूँ। तुम अपना मोबाइल न॰ दो, मैं कल शाम तक बताता हूँ कि क्या और कैसे देना है?”
“ठीक है आप अपना मोबाइल न॰ बताइये मैं मिस कॉल देती हूँ।”
“हाँ, एक मिनट रुको। मैंने अभी नया सिम लिया है तो मुझे अपना न॰ याद नहीं है। मैंने फोन मे सेव किया हुआ है, अभी बताता हूँ।”
मैंने अपना फोन निकाला और उसको अपना न॰ बताया। फिर उसने कॉल की तो मैंने उसका न॰ सेव किया।
इसी बीच हम लोगो का ऑर्डर आ गया। उसने अपना लैपटाप बंद किया और बैग मे डाल लिया।

हम लोगो ने अपना खाना खत्म किया। वो बीच-बीच में पूंछती रहती थी क्योंकि मै बहुत धीरे खा रहा था।
हम लोगो ने अपने बारे मे एक दूसरे को बताया क्योंकि ये हमारी पहली मुलाक़ात थी और हम लोग एक दूसरे को नहीं जानते थे।



हम लोगों की अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गयी। उसने फ़ेसबुक पर फ्रेंड लिस्ट मे जोड़ लिया और इस तरह हम लोग सोशल मीडिया पर भी जुड़ गए।
इसी बीच मैंने घड़ी मे समय देखा। शाम के 4 बज रहे थे।
मैंने कहा, “हमे चलना चाहिए। 4 बज रहे हैं। जल्दी मिलते हैं। और मुझे कहीं और भी जाना है।”
“जी बिलकुल। आपसे मिलकर अच्छा लगा। आप बातें काफी अच्छी करते हो।” उसने हँसते हुये कहा।
“हाहाहाहा, धन्यवाद। मै चलता हूँ। अपना ख्याल रखना।”
मैंने उससे विदा ली और वहाँ से बाहर की ओर चल पड़ा।


दोस्तों आपको यह कहानी कैसी लगी मुझे नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं और शेयर करें धन्यवाद...

11 Nov 2018.


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